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chand baori

चांद बावड़ी (अंधेरे- उजाले कि बावड़ी) आभानेरी

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सामान्य जानकारी :

चांद बावड़ी राजस्थान के दौसा जिले के आभानेरी कस्बे में स्थित है जो बांदीकुई रेलवे स्टेशन से 8 किलोमीटर दूर साबी नदी के निकट पड़ती है चांद बावड़ी राजस्थान की ही नहीं अपितु संपूर्ण भारत की प्राचीनतम बावड़ी है जो आज भी लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र है |

बावड़ी की बनावट एवं विशेषता

दुनिया की सबसे गहरी  यह बावड़ी चारों ओर से वर्गाकार है |  इसकी चौड़ाई लगभग 35 मीटर तथा गहराई 19.8 फीट के लगभग है |  इस बावड़ी में ऊपर से नीचे तक सिड़िया बनी हुई है जो त्रिभुजाकार आकृति में है | 13 सोपान (तल) वाली इस बावड़ी में लगभग 3500 सिड्डीयां (अनुमानित है) इसके ठीक सामने  हर्षत माता का मंदिर स्थित है | चांदनी रात में एकदम दूधिया सफेद रंग की तरह दिखाई देने वाली यह बावड़ी अंधेरे उजाले की बावड़ी नाम से भी प्रसिद्ध है|

तीन मंजिला इस बावड़ी में नृत्य कक्ष व गुप्त सुरंग बनी हुई है साथ ही इसके ऊपरी भाग में बना हुआ परिवर्ती कालीन मंडप इस बावड़ी के काफी समय तक उपयोग में लिए जाने के प्रमाण देता है | स्तम्भयुक्त बरामदे से घिरी हुई यह बावड़ी चारों ओर से वर्गाकार है, इसकी सबसे निचली मंजिल पर बने महिषासुर मर्दिनी व गणेश जी की सुंदर मूर्तियां भी इसे खास बनाती है चांद बावड़ीहर्षद माता मंदिर दोनों की खास बात यह है कि इसके निर्माण में प्रयुक्त पत्थरों पर शानदार नक्काशी की गई है साथ ही इनकी दीवारों पर हिंदू धर्म के सभी 33 करोड़ देवी देवताओं के चित्र भी बने हुए हैं बावड़ी की सीढ़ियों को आकर्षक एवं कलात्मक तरीके से बनाया गया है और इसी खासियत के कारण बावड़ी में नीचे उतरने वाला व्यक्ति वापस उसी सीडी से ऊपर नहीं चढ सकता | आभानेरी गुप्त युग के बाद  तथा आकस्मिक मध्यकाल के स्मारकों के लिए प्रसिद्ध है |

 

चांद बावड़ी का इतिहास

चांद बावड़ी का निर्माण 9 वीं सताब्दी  में  राजा मिहिरभोज ने (जिन्हें  चांद नाम से भी जाना जाता था) करवाया था और उन्हीं के नाम पर इस बावड़ी का नाम चांद बावड़ी रखा गया | यह बावड़ी आभानेरी कस्बे में स्थित है जिसका प्राचीन नाम”आभा नगरी “अर्थात चमकने वाली नगरी था | यहाँ के राजा चांद कस्बे के लोगों को हमेशा खुशी और उल्लास के साथ देखना चाहते थे इसके लिए वह हर्षत माता कि पूजा किया करते थे |उन्होंने ही चांद बावड़ी के सामने हर्षत माता के मंदिर का भी निर्माण करवाया था |जो आज भी प्रसिद्ध है|

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जानकारी के मुताबिक मंदिर के पुजारी के अनुसार मंदिर में 6 फुट की नीलम के पत्थर की हर्षद माता की मूर्ति 1968 में चोरी हो गई हर्षद माता गांव में आने वाले संकट के बारे में पहले ही चेतना दे देती थी जिससे गांव वाले सतर्क हो जाते और माता उनकी रक्षा करती थी इसे हर्ष और उल्लास के साथ समृद्धि की देवी भी कहा जाता हैं|

ऐसा कहा जाता है कि 1021 से 26 ईसवी के काल में मोहम्मद गजनबी ने इस मंदिर को तोड़ दिया था तथा सभी मूर्तियों को खंडित कर दिया था खंडित मूर्तियां आज भी मंदिर परिसर तथा चांद बावड़ी में सुरक्षित रखी हुई है जयपुर के राजा ने 18वीं शताब्दी में इसका कायाकल्प करवाया था इस बावड़ी में एक सुरंग भी है जिसकी लंबाई लगभग 17 किलोमीटर है जो पास के एक गांव भांडारेज में निकलती है कहा जाता है कि युद्ध के समय राजा एवं सैनिकों द्वारा इस सुरंग का इस्तेमाल किया जाता था |

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